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सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कहानी कल्पना कितनी, हक़ीक़त कितनी?

 सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कहानी कल्पना कितनी, हक़ीक़त कितनी?



 ''दुर्भाग्य से हमारी इतिहास की किताबों में पृथ्वीराज चौहान के बारे में सिर्फ़ दो या तीन लाइनें लिखी हुई हैं. आक्रमण करने वालों पर लिखा हुआ है, लेकिन हमारे खुद के राजाओं पर दो-दो लाइनें लिखी हैं. 

हमारे राजा भी महान थे. उनकी कहानी सबके सामने लाइए. मुझे फ़िल्म के डायरेक्टर डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहानियां सुनाईं तो मुझे लगा कि पृथ्वीराज चौहान के बारे में इतनी सारी बातें हैं और हमें पता नहीं. मैंने इनसे कहा भी कि ये सब सही हैं न डॉक्टर साहब, ये सब काल्पनिक तो नहीं है न?''

तो आइए हम भी यही समझने की कोशिश करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान की लोकप्रिय कहानियां कल्पना हैं या हक़ीक़त? शिलालेखों और इतिहास की किताबों में पृथ्वीराज चौहान को लेकर क्या कुछ दर्ज है और पृथ्वीराज चौहान के कुछ किस्सों को कवि की कल्पना और हक़ीक़त कहने वालों के क्या तर्क हैं?

पृथ्वीराज रासो महाकाव्य से एक दोहा जिसमें शब्दभेदी बाण के ज़रिए मोहम्मद गोरी की हत्या करने की बात कही गई

पृथ्वीराज रासो क्या है?

फ़िल्म, टीवी सीरियलों, दादी-नानी के क़िस्सों या रिश्तेदारों के वॉट्स ऐप ग्रुप में संभवत: आपने पृथ्वीराज चौहान की जो कहानियां पढ़ी या देखी होंगी वो संभवत: इसी 'पृथ्वीराज रासो' से निकली हैं.

पृथ्वीराज रासो एक बड़ी कविता है जिसे आदिकाल यानी साल 1000-1400 के दौर की रचना माना जाता है. हिंदी साहित्य को चार भागों में बांटा गया है- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिककाल. साहित्य के इतिहास के इसी विकासक्रम में शुरुआती दौर को आदिकाल कहा जाता है.

पृथ्वीराज रासो एक ऐसी कविता है जिसमें पृथ्वीराज चौहान की कहानी बताई गई है. इस कविता के लेखक चंद बरदायी बताए जाते हैं.

पृथ्वीराज रासो की कहानी कुछ यूं है, ''पृथ्वीराज अजमेर के राजा सोमेश्वर के बेटे थे. सोमेश्वर की शादी दिल्ली के राजा अनंगपाल की बेटी कमला से हुई. दूसरी बेटी की शादी कन्नौज के राजा विजयपाल से हुई जिनसे जयचंद पैदा हुए. अनंगपाल ने नाती पृथ्वीराज को गोद लिया. जयचंद को बुरा लगा. बाद में जयचंद ने यज्ञ का आयोजन किया और बेटी संयोगिता का स्वयंवर रखा. पृथ्वीराज यज्ञ में नहीं आए. गुस्साए जयचंद ने पृथ्वीराज की मूर्ति दरवाज़े पर रखवाई. संयोगिता को पहले से पृथ्वीराज पसंद थे. 

संयोगिता ने मूर्ति पर माला डालकर अपने प्रेम का इज़हार किया. बाद में पृथ्वीराज आए, लड़ाई करके संयोगिता को दिल्ली ले आए.''

पृथ्वीराज रासो के मुताबिक़, ''पृथ्वीराज का ध्यान संयोगिता पर ज़्यादा रहा. इस बीच मोहम्मद गोरी का हमला हुआ. पृथ्वीराज ने हराया और गोरी को छोड़ दिया. गोरी ने फिर हमला किया और पृथ्वीराज पकड़कर गजनी ले जाए गए. पीछे से कवि चंद बरदायी भी पहुंच गए. चंद के इशारे पर पर पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण चलाकर पहले गोरी को मारा और फिर एक-दूजे को मारकर मर गए.''

तो ये थी पृथ्वीराज रासो की वो कहानी जो लोक कथाओं में भी शामिल है और एक बड़े तबके के लिए हक़ीक़त भी है.

पर हिंदी साहित्य के जाने-माने विद्वान और इतिहासकार इसे सच नहीं मानते हैं.

कब रचा गया पृथ्वीराज रासो?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहासकार और बड़े विद्वान थे जिनका जन्म 1884 और निधन 1941 में हुआ था.

अपनी किताब 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में आचार्य शुक्ल ने लिखा, ''पृथ्वीराज रासो में दिए हुए साल (संवत्) ऐतिहासिक तथ्यों के साथ मेल नहीं खाते हैं. ऐसे में पृथ्वीराज के दौर में इसके लिखे जाने पर संदेह है. अनेक विद्वानों ने इन कारणों से पृथ्वीराज रासो को 16वीं शताब्दी (साल 1500 से 1600) में लिखा हुआ एक जाली ग्रंथ ठहराया है. रासो में चंगेज, तैमूर जैसे कुछ बाद के शासकों के नाम आने से ये शक और मज़बूत होता है.''

आचार्य शुक्ल की ऊपर लिखी बात को एक ऐतिहासिक तथ्य से समझते हैं.

पृथ्वीराज चौहान का शासनकाल साल 1177 से 1192 था. ऐसे में चंद बरदायी या उनके बेटों का पृथ्वीराज रासो में लगभग 200 साल बाद के शासक तैमूर का ज़िक्र करना कैसे संभव है?

मशहूर इतिहासकार और हिंदी लेखक रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी 'पृथ्वीराज रासो' को कल्पना और तथ्यों से दूर बताया.

आचार्य शुक्ल ने लिखा है, ''पृथ्वीराज की राजसभा के कश्मीरी कवि जयानक ने संस्कृत में 'पृथ्वीराज विजय' नाम का काव्य लिखा है जो पूरा नहीं मिलता है. इस पृथ्वीराज विजय की घटनाएं इतिहास के हिसाब से सटीक लगती हैं. इसमें पृथ्वीराज की मां का नाम कर्पूरदेवी लिखा है जिसका समर्थन हाँसी के शिलालेख से भी होता है.''

हाँसी हरियाणा के हिसार में पड़ता है. ये जगह पृथ्वीराज चौहान के क़िले की वजह से भी मशहूर है.

यहां से मिले शिलालेखों या दानपत्र और प्राचीन सिक्के भी पृथ्वीराज रासो में लिखे साल (संवत) से मेल नहीं खाते हैं.

उदाहरण के लिए चंद ने पृथ्वीराज और मोहम्मद गोरी के युद्ध के बारे में संवत् 1115 यानी साल 1080 में लिखा. जबकि शिलालेख और फ़ारसी इतिहास के मुताबिक़, गोरी और पृथ्वीराज चौहान का युद्ध साल 1191 में हुआ था. भारतीय इतिहास की किताबों में भी यही साल मिलता है.


पृथ्वीराज रासो के पक्ष, विपक्ष में क्या तर्क हैं?

ऐसा नहीं है कि पृथ्वीराज रासो को सही ठहराने के पक्ष में जानकारों ने राय ना दी हो.

पर यहां पहले ये समझना ज़रूरी है कि शक संवत, विक्रम संवत् और इंग्लिश कैलेंडर में क्या फ़र्क़ है?

शक संवत् इंग्लिश कैलेंडर से 78 साल पीछे और विक्रम संवत् 57 साल आगे चलता है.

पंडित मोहन लाल विष्णु लाल पंड्या, बाबू श्याम सुंदर दास और डॉक्टर दशरथ शर्मा हिंदी के बड़े जानकार माने गए. ये लोग 'पृथ्वीराज रासो' को सही मानने के पक्ष में रहे.

पंड्या के मुताबिक़, ''पृथ्वीराज रासो में संवत का फ़र्क़ 90-91 साल के अंतर के नियम से पड़ता है और ये अंतर भूल नहीं बल्कि जान-बूझ कर रखा गया है.''

इसके पक्ष में पंड्या ने पृथ्वीराज रासो के एक दोहे का ज़िक्र किया.

''एकादस सै पंचदह विक्रम साक अनंद....'' जिसमें साक अनंद का अर्थ बताया गया- शून्य और नंद यानी 9 अर्थात 90 रहित विक्रम संवत्.

लेकिन आचार्य शुक्ल समेत कई विद्वानों ने ये सवाल उठाया कि ऐसे कैसे 90 साल घटा दिए गए?

आचार्य शुक्ल ने अपनी किताब में लिखा, ''नंदवंशी शूद्र थे, इसलिए उनके शासनकाल को राजपूतों ने निकाल दिया, पंड्या के ऐसे तर्क सिर्फ़ कल्पना ही हैं क्योंकि आज तक कहीं से भी किसी प्रचलित विक्रम संवत् से कुछ साल निकालने का कोई मामला सामने नहीं आया है. पृथ्वीराज रासो अगर किसी समसामयिक कवि ने रचा होता तो कुछ थोड़े से अंश ही पीछे से मिले होते तो कुछ घटनाएं तो ठीक होतीं.''

डॉक्टर नागेंद्र और डॉक्टर हरदयाल के संपादन में छपी किताब 'हिंदी साहित्य' में भी इस बारे में और जानकारी मिलती है.

किताब में लिखा है, ''पृथ्वीराज रासो को जाली मानने वालों का एक तर्क ये भी था कि इसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों का इस्तेमाल किया गया. पर इसे ये कहकर रासो समर्थकों ने ख़ारिज किया कि कवि चंद लाहौर के रहने वाले थे और ये इलाक़ा मुसलमानों के प्रभाव में आ गया था इसलिए भाषा में अरबी-फ़ारसी आना लाज़िमी है.''

इन सबके बावजूद अगर सिर्फ़ इतिहास के नज़रिए से देखें तो ज़्यादातर जानकारों ने कहा कि पृथ्वीराज रासो की घटनाएं इतिहास से नहीं मिलती हैं.

पृथ्वीराज रासो का लेखन काल और बहस

संभव है आपके मन में ये ख़्याल आ रहा हो कि फिर ये इतना बड़ा 'पृथ्वीराज रासो' किसने लिखा और कब लिखा?

गौरीशंकर ओझा के मुताबिक़, ''पृथ्वीराज रासो 1600 विक्रम संवत् यानी साल 1543 में लिखा गया. यानी पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के 351 साल बाद.''

आचार्य शुक्ल ने लिखा, ''ऐसा लगता है कि पृथ्वीराज के बेटों गोविंदराज या हरिराज के किसी वंशज के यहां चंद नाम कोई भट्ट कवि रहा होगा जिसने उनके पूर्वज पृथ्वीराज की वीरता को लेकर कुछ लिखा हो. इन्हीं सब को उसी दौर का मानकर रासो के नाम से ये इमारत खड़ी की गई हो.''

भाषा के स्तर पर भी पृथ्वीराज रासो को जानकारों ने खरा नहीं माना. कहा गया कि कहीं-कहीं इसकी भाषा आधुनिक लगती है तो कहीं प्राचीन.

लेकिन हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना था कि पृथ्वीराज रासो में 12वीं शताब्दी की भाषा संयुक्ताक्षरमयी अनुस्वारांत प्रवृति वाली मिलती है जिससे ये 12वीं सदी का ग्रंथ लगता है.

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य और हिंदी भाषा के एक जाने-माने जानकार विश्वनाथ त्रिपाठी भी हैं.

अपनी किताब 'हिंदी साहित्य का सरल इतिहास' में विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं, ''पृथ्वीराज का रचनाकाल और इसका मूलस्वरूप सबसे ज़्यादा विवादास्पद है. इसलिए जब डॉक्टर बूलर को पता चला कि रासो की तारीख़, व्यक्तियों के नाम और घटनाएं इतिहास से मिलती नहीं हैं तो उन्होंने इसको प्रकाशित ना करने की सिफ़ारिश की.''

डॉक्टर बूलर वहीं शख़्स थे जिन्हें 1875 में कश्मीर से जयानक भट्ट की संस्कृत में लिखी 'पृथ्वीराज विजय' मिली. पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज चौहान की जो कहानी मिलती है, वो इतिहास और तारीख़ों के हिसाब से हक़ीक़त के ज़्यादा क़रीब लगती है.

'पृथ्वीराज रासो' को प्रचारित करने का श्रेय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी और इतिहासकार, स्कॉलर कर्नल जेम्स टोड को भी जाता है. जेम्स टाड राजस्थान में तैनात होने वाले शुरुआती ब्रिटिश अधिकारियों से एक थे.

साल 1829 की अपनी किताब 'Annals and Antiquities of Rajasthan' में जेम्स टोड ने पृथ्वीराज रासो की कहानी को शामिल किया. साथ ही कई बार पृथ्वीराज चौहान के लिए 'अंतिम हिंदू शासक' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया.

पृथ्वीराज चौहान का सच क्या है?

संभव है कि आप ये सोच रहे होंगे कि अगर पृथ्वीराज रासो की प्रमाणिकता सवालों के घेरे में है तो पृथ्वीराज चौहान का सच क्या है?

अब हम आगे की कहानी में इतिहासकारों और 'पृथ्वीराज विजय' के ज़रिए यही समझने की कोशिश करते हैं.

मध्यकालीन भारत के एक जाने-माने इतिहासकार सतीश चंद्र माने जाते हैं. सतीश चंद्र ने अपनी किताब मध्यकालीन भारत में पृथ्वीराज चौहान पर लिखा था.

इस किताब के अध्याय-5 में सतीश चंद्र ने बताया, ''गुजरात के राजाओं के अधीन रह चुके चौहानों ने दसवीं सदी के अंतिम सालों में नदौल में राजधानी बसाई. इस वंश के शासक विग्रहराज ने चित्तौड़ पर क़ब्ज़ा किया और अजयमेरू यानी अजमेर को बसाया. विग्रहराज ने धिल्लिका यानी दिल्ली को 1151 में तोमरों से छीना. चौहान राजाओं में सबसे मशहूर पृथ्वीराज तृतीय थे जो साल 1177 के आस-पास गद्दी पर बैठे. पृथ्वीराज ने तत्काल प्रसार की नीति अपनाई और कई छोटे-छोटे राजपूत राज्यों पर जीत हासिल की. गुजरात के चालुक्य राजा के ख़िलाफ़ संघर्ष में वो सफ़ल नहीं हुए इसलिए गंगा घाटी की ओर मुड़ गए.''

सतीश चंद्र ने किताब में लिखा, ''पृथ्वीराज ने बुंदेलखंड की राजधानी महोबा के ख़िलाफ़ अभियान चलाया. यही वो संघर्ष था जिसमें आल्हा और ऊदल नाम के मशहूर योद्धा मारे गए.'' हालांकि प्रचलित कहानियों और महोबा में आज भी सुनाए जाते आल्हा खंड में ये कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई में ऊदल मारे गए थे जिसका बदला लेने के लिए आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान से जंग लड़ी और उन्हें हराकर गुरु के कहने पर जीवनदान भी दिया.

किताब के मुताबिक़, ''कन्नौज के जयचंद ने इस संघर्ष में महोबा के चंदेल राजा की मदद की थी. दिल्ली और पंजाब पर नियंत्रण के प्रयासों का गहड़वालों ने भी मुकाबला किया था. यही दुश्मनी थी जिनके कारण पंजाब से गज़नवियों को बाहर करने के लिए राजपूत राजाओं का आपस में मेल असंभव हो पाया.''

ये वही जयचंद थे जिनको लेकर पृथ्वीराज रासो में कई वजहों से पृथ्वीराज चौहान की दुश्मनी बताई गई थी.

गोरी और पृथ्वीराज के बीच पहली लड़ाई

अफ़ग़ानिस्तान के काबुल से क़रीब 400 किलोमीटर दूर एक प्रांत है- ग़ोर.

यही वो जगह है जिसके नाम पर शहाबुद्दीन मुहम्मद उर्फ़ मुईज़ुद्दीन मुहम्मद बिन साम का नाम मोहम्मद गोरी भी कहलाया और पूरा भारत आज भी उन्हें इसी नाम से जानता है.

साल 1173 में ग़ज़नी की गद्दी पर मोहम्मद गोरी बैठे. 1178 में गोरी ने रेगिस्तान के रास्ते गुजरात में घुसने की कोशिश की, लेकिन शिकस्त मिली. गोरी ने तैयारी के साथ लौटकर 1190 तक लाहौर, पेशावर और सियालकोट को जीता.

इधर चौहान राजाओं की ताक़त बढ़ चुकी थी. वो कई आक्रमणकारी तुर्कों को मारकर या हराकर खदेड़ चुके थे.

उधर वक़्त दो विस्तारपसंद राजाओं का इंतज़ार कर रहा था. मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच 1191 में तराइन (करनाल, हरियाणा) में लड़ाई हुई.

ये लड़ाई तबरहिंद (भठिंडा) पर दोनों के दावों के चलते हुई.

इतिहासकारों के मुताबिक़, पृथ्वीराज चौहान की सेना के सामने मोहम्मद गोरी की सेना तबाह हो गई. मोहम्मद गोरी की जान भी एक युवा खलजी सवार ने बचाई.

पृथ्वीराज चौहान तबरहिंद की ओर बढ़े. 12 महीने की घेराबंदी के बाद तबरहिंद पर जीत दर्ज की. पृथ्वीराज ने पंजाब से मोहम्मद गोरी की सेना को खदेड़ने की कोशिश नहीं की.

इधर मोहम्मद गोरी दूसरी जंग की तैयारी में जुट चुका था.

1192 का तराइन युद्ध: पृथ्वीराज का क्या हुआ?

1192 की ये लड़ाई भारत का इतिहास बदलने वाली थी.

कहा जाता है कि मोहम्मद गोरी एक लाख 20 हज़ार सैनिकों के साथ आगे बढ़ा. उसके साथ एक भारी घुड़सवार सेना और 10 हज़ार घुड़सवार तीरंदाज़ थे.

इतिहासकार सतीश चंद्र ने लिखा, ''पृथ्वीराज की पिछली विजय का सिपहसालार स्कंद कहीं और युद्धरत था. जैसे ही पृथ्वीराज को गोरी के ख़तरे का अंदाज़ा हुआ, उन्होंने राजाओं से मदद मांगी. कई राजाओं ने मदद की सिवाय कन्नौज के राजा जयचंद के.''

किताब में ये लिखा है कि जयचंद के इस मौक़े पर मदद ना करने की वजह संयोगिता से शादी करने जैसी कहानियां नहीं थीं बल्कि पुरानी दुश्मनी थी. ऐसे में जयचंद का किनारा करना कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी.

सतीश चंद्र के मुताबिक़, ''पृथ्वीराज ने तीन लाख की फ़ौज़ उतारी जिसमें घुड़सवारों की संख्या ज़्यादा थी और 300 हाथी थे. भारतीय सेना संख्या में ज़्यादा थी पर नेतृत्व मोहम्मद गोरी की सेना का ज़्यादा बेहतर था.''

युद्ध में भारतीय सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए.

सतीश चंद्र की मध्यकालीन भारत की किताब में लिखा है, ''युद्ध से पृथ्वीराज बच निकले, लेकिन सिरसा के पास पकड़े गए. तुर्क सेनाओं ने हाँसी, सरस्वती और समाना की गढ़ियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. फिर अजमेर पर हमला करके वहां भी क़ब्ज़ा जमा लिया. पृथ्वीराज को कुछ समय तक अजमेर पर शासन करने की अनुमति दी गई.''

इस बात की गवाही देते उस काल के वो सिक्के भी हैं जिन पर एक ओर तारीख़ है और 'पृथ्वीराज देव' लिखा है और दूसरी ओर 'श्री मोहम्मद साम' लिखा हुआ है.

सतीश चंद्र की किताब मध्यकालीन भारत के पृष्ठ 68 पर लिखा है, ''कुछ दिनों बाद पृथ्वीराज को तथाकथित षड्यंत्र के आरोप में मार डाला गया और उसकी जगह उसका बेटा गद्दी पर बैठा. कुछ वक्त बाद पृथ्वीराज के बेटे रणथंभौर चले गए और नए शक्तिशाली चौहान राज्य की नींव डाली और इस तरह दिल्ली का इलाक़ा और पूर्वी राजस्थान तुर्क शासन के अधीन हो गया.''

तराइन की लड़ाई के बाद मोहम्मद गोरी क़ुतबुद्दीन ऐबक जैसे सरदारों के हवाले दिल्ली छोड़कर ग़ज़नी लौट गया.

1194 में फिर भारत लौटे गोरी की लड़ाई जयचंद से हुई और लगभग लड़ाई जीत चुके जयचंद की एक तीर लगने से मौत हो गई.

इतिहास की किताब में लिखा है कि मोहम्मद गोरी ने अपना अंतिम अभियान 1206 में खोखरी के ख़िलाफ़ चलाया और ख़ूब ख़ून बहाया. लेकिन जब मोहम्मद गोरी ग़ज़नी लौट रहे थे, तब एक कट्टरपंथी मुसलमान ने गोरी को मार डाला.

पृथ्वीराज चौहान: जितने मुंह उतनी बातें

पृथ्वीराज चौहान की कहानी उस दौर की है जिसे हिंदी साहित्य में आदिकाल या वीरगाथा काल कहा जाता है. यानी उस दौर में जो लिखा जा रहा था वो राजाओं की वीरता का बयान करने के लिए लिखा जा रहा था.

साथ ही भारत जैसे विश्वास और मान्यताओं से भरी परंपराओं वाले देश में पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी कहानियां यहीं ख़त्म नहीं होती हैं.

पृथ्वीराज से जुड़ी कई कहानियां कई अन्य दस्तावेज़ों में भी मिलती हैं. फिर चाहे कश्मीर में डॉक्टर बूलर को मिली 'पृथ्वीराज विजय' हो या फिर 'ताज अल मासिर', 'तबक़ात-ए-नासिरी', 'पृथ्वीराज प्रबंध', 'प्रबंध चिंतामणि' और 'पुरातन प्रबंध संग्रह'.

हर लिखा हुआ दस्तावेज़ पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी नई कहानी ही बताता है. उदाहरण के लिए जैन दस्तावेज़- प्रबंध चिंतामणि. इसके मुताबिक़, पृथ्वीराज चौहान कई दिनों तक सोते रहते और जब आक्रमण होता तो उठाए ना उठते.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में इतिहास पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर सिंथिया टैलबोट ने भी 'द लास्ट हिंदू एम्परर' किताब लिखी है.

इस किताब में प्रोफ़ेसर सिंथिया डॉक्टर बूलर को कश्मीर में मिली 'पृथ्वीराज विजय' को हक़ीक़त के ज़्यादा क़रीब बताती हैं. हालांकि इसमें 1192 की हार का ज़िक्र नहीं है पर चूंकि इसका नाम ही 'पृथ्वीराज विजय' है तो ऐसे में इसमें लिखी बातें सही भी लगती हैं.

हसन निज़ामी के लिखे फ़ारसी दस्तावेज़ 'ताज-अल-मासिर' में मोहम्मद गोरी को महान और 1191 की हार को छिपाया गया है और विद्रोह करने के कारण पृथ्वीराज चौहान को मौत की सज़ा सुनाने की बात लिखी गई है.

लेकिन अगर तथ्यों के लिहाज़ से देखा जाए तो फ़ारसी दस्तावेज़ों में 'तबक़ात-ए-नासिरी' सच के क़रीब है. इसके लेखक मिनहाज़ उस सिराज़ जुज़ैनी पढ़े-लिखे परिवार से ताल्लुक रखते थे और जिनको इतिहास की अच्छी समझ भी थी.

मिनहाज़ ने गोरी की नाकामियों पर भी लिखा था और पृथ्वीराज के हाथों मिली हार का ज़िक्र भी किया था. मिनहाज़ के लिखे में हाँसी का ज़िक्र भी आता है, जहां से मिले साक्ष्य प्रमाणिक हैं और कल्पना नहीं, हक़ीक़त हैं.

किताबों से इतर दुनिया

प्रोफ़ेसर सिंथिया लिखती हैं, ''ऐतिहासिक किरदार पृथ्वीराज चौहान के बारे में जानना बेहद मुश्किल है क्योंकि उस दौर की चीज़ें कम ही बची हैं या मिल पाई हैं.''

लेकिन इन सब दस्तावेज़ों या किताबों से दूर अजमेर के पृथ्वीराज स्मारक में पृथ्वीराज चौहान की बड़ी-सी मूर्ति लगी है जिसमें उनके हाथ में तीर-धनुष है और वो घोड़े पर सवार निशाना साधते दिख रहे हैं.

मूर्ति के नीचे खड़े लोग हाथ जोड़कर नमन करते दिखते हैं. इनमें से ज़्यादातर लोगों के लिए पृथ्वीराज चौहान की कहानी वही पूरी सच्ची है जो 'पृथ्वीराज रासो' में लिखी है या जो अक्षय कुमार की फ़िल्म 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' में दिखाई गई है.

अक्षय कुमार फ़िल्म प्रमोशन के अपने उस इंटरव्यू में इतिहास की किताबों को फिर से लिखने और बैलेंस करने की शिक्षा मंत्री से अपील करते हैं.

साथ ही अक्षय कुमार एक इंटरव्यू में डायरेक्टर डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के फ़िल्म 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' के '18 साल तक किए होमवर्क' की तारीफ़ करते हैं.

अक्षय कहते हैं, ''मुझे तो कई लोगों ने कहा कि होमवर्क काफ़ी किया होगा. मैंने कहा कि ''होमवर्क मैं क्यों करूं. इसके ऊपर अगर मैंने होमवर्क कर दिया तो मैंने तो सत्यानाश कर देना है.''

इतिहास और ऐतिहासिक नायकों से जुड़े तथ्यों को लेकर विवाद होते रहे हैं, लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि इतिहास को इतिहास के आईने में ही देखा जाए ना कि वर्तमान के मापदंडो के आधार पर.

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