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कहानी उसी महिला डकैत गौहर बानो उर्फ पुतली बाई की जिसने पुलिसवालों से बदला लेने के लिए उनकी उंगलियां काट दी थीं और उनकी बीबियों के कान चीर दिए थे

 


21 साल की गौहर बानो गांव में ही अपनी महफिल सजाती थी। नाचते वक्त उसके पैर बिजली की तरह थिरकते थे और जब गाती थी तो लोग मदहोश हो जाते थे। देखने में इतनी सुंदर थी कि दूर-दूर के गांवों तक उसकी सुंदरता की चर्चाएं होने लगी थी। कहते हैं, जब नाचती थी तो पुतली की तरह दिखती थी इसलिए लोग उसे पुतली बाई कहकर बुलाने लगे थे।

उसकी महफिल में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी महफिल के चर्चे आगरा, लखनऊ और कानपुर तक होने लगे थे। अब बड़े-बड़े शहरों के लोग गौहर की महफिल देखने बरबई गांव पहुंचने लगे थे। गांव में पुतली के चहेतों की इतनी भीड़ होने लगी थी कि संभाली नहीं जा रही थी इसलिए पुतली को आगरा शिफ्ट होना पड़ा।


आगरा में 100 से ज्यादा दुश्मन बन गए, इनमें पुलिस भी शामिल
अब पुतली बाई की महफिल आगरा में जमने लगी। पूरे यूपी के लोगों पर गौहर का नशा चढ़ता जा रहा था। उसकी महफिल का हिस्सा बनने के लिए बड़े-बड़े लोग लाइन लगा कर खड़े होने लगे थे। वह बड़े बड़े घरों की महफिलों की शान बनने लगी थी उस कम उम्र में पुतली ने वो सब हासिल कर लिया था जिसके लोग सिर्फ सपने ही देखा करते हैं। लेकिन इसी बीच उसके दुश्मनों की तादाद भी बढ़ने लगी इन दुश्मनों में पुलिस वाले भी शामिल थे।

दरअसल, रसूखदारों के साथ पुलिस वाले भी गौहर के दीवाने हो चुके थे। हर कोई उसे अपना बनाना चाहता था। एक पुतली किस-किस का साथ देती? वो सबको मना करती गई और लोग उसके दुश्मन बनते गए। सब उसकी महफिल में दिक्कतें पैदा करने लगे। उसकी महफिल में कभी आग लगा दी जाती तो कभी गोलियां चल जातीं।

पुतली को जान से मारने की धमकी दी जाने लगी थी। पुतली ने एक अखबार को बताया था, “उसको धमकाने और परेशान करने वाले लोगों की संख्या 100 से ज्यादा थी।” इन्हीं सब परेशानियों के चलते पुतली को वापस अपने गांव आना पड़ा।जा

 बताते हैं, वह बहुत ज्यादा खूबसूरत थी।

पुतली के घुंघरुओं की आवाज चंबल तक पहुंची, कुख्यात डाकू सुल्ताना से सामना हुआ
गांव आकर पुतली फिर नाचने-गाने लगी। भले ही पुतली आगरा से वापस आ गई थी, लेकिन उसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई थी। अब पुतली के डांस और उसकी सुंदरता की चर्चा चंबल तक होने लगी थी। चंबल से सैकड़ों डाकू उसके दीवाने होते जा रहे थे।

एक दिन पुतली की सुंदरता की चर्चा उन दिनों से सबसे कुख्यात डाकू सुल्ताना तक पहुंची। सुल्ताना महिलाओं का सम्मान किया करता था, लेकिन चर्चाएं इतनी ज्यादा होने लगी थीं कि एक दिन उसको भी पुतली की महफिल का हिस्सा बनने जाना पड़ा।


दरअसल पुतली के पड़ोस के गांव ‘सिरीराम का पुरा’ में उसका कार्यक्रम चल रहा था। सुल्ताना भी वहां पहुंच गया। पुतली का डांस देख उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। पुतली की एक-एक अदा उसके दिल में उतर गई थी। उसने पूरा डांस देखा और 500 रुपए का इनाम देखकर वापस आ गया।

सुल्ताना वापस बीहड़ तो आ गया, लेकिन उसका दिल पुतली पर ही अटका हुआ था। सुल्ताना पुतली का दीवाना हो चुका था। एक दिन सुल्ताना को पता चलता है कि पुतली धौलपुर गांव की एक शादी में महफिल जमाने आई है। रात को 2 बजे फायरिंग करते हुए सुल्ताना वहां पहुंच जाता है।

महफिल में सन्नाटा पसर जाता है। सुल्ताना पुतली की तरफ बढ़ता है। पुतली बिना डरे वहीं खड़ी रहती है और पूछती है, “कौन है तू?” सुल्ताना जवाब देता है, “तुम्हारा चाहने वाला, तुम्हें अपने साथ ले जाने आया हूं। मेरे साथ चलो।” पुतली मना कर देती है। तो सुल्ताना तबले पर बैठे उसके भाई के सीने पर बंदूक तान देता है। भाई की जान बचाने के लिए पुतली उसके साथ बीहड़ चली जाती है।

पुतली प्रेग्नेंट हुई, सुल्ताना ने वापस भेज दिया
बीहड़ ले जाने के बाद सुल्ताना ने पुतली की निगरानी में 20 डाकू लगा दिए। पुतली चाह कर भी नहीं भाग पा रही थी। समय बीतता गया। बीहड़ में सुल्ताना की दरियादिली को देख पुतली भी उसे अपना दिल दे बैठी। दोनों के प्यार के किस्से आम हो गए। गांव-गांव में पुतली और सुल्ताना के प्यार की चर्चाएं होने लगी।

प्यार हो जाने के बाद भी पुतली को बीहड़ की जिंदगी पसंद नहीं आ रही थी। इसी बीच पुतली प्रेग्नेंट हो गई और उसने सुल्ताना से कहा, “मैं अपने बच्चे को इस अपहरण और हत्याओं वाले माहौल में जन्म नहीं देना चाहती।” सुल्ताना भी अपने बच्चे को डाकू नहीं बनाना चाहता था इसलिए उसने पुतली को वापस गांव भेज दिया।

गांव पहुंचते ही पुलिस ने पकड़ लिया और बलात्कार किया
जैसे ही पुतली वापस गांव आई, पुलिस ने उसे पकड़ लिया और सुल्ताना के बारे में पूछताछ करने लगी। पुतली जानती सब थी, लेकिन उसने अपना मुंह नहीं खोला। इसके चलते पुलिस ने उसे बेइंतहा पीटा और प्रेग्नेंट होने के बाद भी उसके साथ बलात्कार किया। फिर जैसे ही सुल्ताना कोई कांड करता पुलिस पुतली को पकड़ लेती और उसके साथ उसके परिवार वालों को भी मारती। ये सिलसिला 4 महीनों तक चलता रहा।


पुतली की वजह से उसके घरवालों को भी पुलिस की मार खानी पड़ रही थी इसलिए उसने वापस बीहड़ जाने का मन बना लिया। अब वो गांव में सिर्फ अपने बच्चे को जन्म देने के लिए रुकी हुई थी। कुछ दिनों बाद उसने एक बेटी को जन्म दिया, उसका नाम तन्नो रखा। बेटी को मां के पास छोड़कर वो वापस सुल्ताना के पास चली गई।

पुतली दोबारा बीहड़ पहुंची और इस बार मूड बना कर पहुंची थी
बीहड़ में वापसी के बाद पुतली ने सुल्ताना से हथियार चलाना सिखाने को कहा। सुल्ताना ने पुतली को हर तरह का हथियार चलाने की ट्रेनिंग दे दी। अब पुतली बीहड़ के रंग में रंगने लगी थी। गांव में रहने के दौरान पुलिस ने पुतली को इतना प्रताड़ित कर दिया था कि अब उसके दिल से किसी भी बात का खौफ खत्म हो गया था।

पुतली गैंग के साथ मिलकर लूट अपहरण और हत्याओं जैसी वारदातों को अंजाम देना शुरू कर देती है। सुल्तान उसे लूटी हुई रकम का बंटवारा करने की जिम्मेदारी सौंप देता है। इसी बीच एक दिन धौलपुर के रजई गांव में सुल्ताना गैंग की पुलिस से मुठभेड़ हो जाती है। दोनों तरफ से खूब गोलीबारी होती है। सारी गैंग बचकर भाग जाती है, लेकिन पुतली पुलिस की पकड़ में आ जाती है।

पुतली को कुछ दिन तारागंज की जेल में रखा जाता है फिर धौलपुर शिफ्ट कर दिया जाता है। यहां भी पुलिस उसका बलात्कार करती है। कुछ दिनों बाद जमानत मिलते ही पुतली फिर से बीहड़ पहुंच जाती है।


बलात्कार करने वाले पुलिस वालों की उंगलियां काट दीं, बीबियों के कान नोंच लिए
चंबल की पहली महिला डाकू बन चुकी पुतली बाई के दिमाग में पुलिस के खिलाफ नफरत भर चुकी थी। तीसरी बार बीहड़ पहुंचने के बाद उसने उन सभी पुलिस वालों को चुन-चुन कर मारा जिन्होंने उसका बलात्कार किया था। वो अपनी गैंग के साथ एक-एक पुलिस वाले के घर गई। फायरिंग करते हुए घर के अंदर घुसी। पुलिस वालों को पकड़ कर उनके हाथों की दसों उंगलियों को काट डाला और उनकी अंगूठियां छीन लीं।

इसके साथ ही पुतली ने उनकी बीबियों के कानों को चीरते हुए गहने नोच लिए थे। उस दिन उन पुलिसवालों के घरों में सिर्फ चीखों की आवाजें थीं। पुतली बाई की इस खौफनाक वारदात के बाद पूरे चंबल में उसकी दहशत फैल गई।

सुल्ताना डाकू मारा गया, पुतली ने जवाहरलाल नेहरू को चिट्ठी लिख दी
इसी बीच अपनी गैंग को बड़ा करने के लिए सुल्ताना डाकू ने डाकू लाखन सिंह से हाथ मिला लिया। पहले लाखन डाकू से सुल्ताना का छत्तीस का आंकड़ा था। पुतली को इस बात का एहसास था कि लाखन भरोसे के लायक नहीं है। उसने सुल्ताना को समझाया भी, लेकिन वो नहीं माना।

25 मई 1955 को अर्जुनपुर गांव में दोनों डाकुओं के गिरोहों की बैठक चल रही थी। लाखन ने पुलिस को पहले ही इस मीटिंग की जानकारी दे रखी थी। पुलिस ने सुल्ताना की गैंग को घेर लिया। मुठभेड़ में सुल्ताना का राइट हैंड मातादीन मारा गया। पुतली भी वहीं मौजूद थी। सुल्ताना ने अपने खास गुर्गे बाबू लोहार से कहा, “पुतली को यहां से ले जाओ।”

इसी बीच लाखन के इशारे पर उसके साथी कल्ला ने सुल्ताना पर गोलियों की बौछार कर दी। सुल्ताना वहीं पुतली बाई के सामने मारा गया। पुतली भीतर ही भीतर टूट गई। सुल्ताना के मरने के बाद बाबू लोहार ने लाखन से हाथ मिला लिया। पुलिस ने मीडिया को बताया कि सुल्ताना का एनकाउंटर पुलिस ने ही किया है।


इसके बाद साल 1956 में पुतली बाई ने तब के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को खत लिख कर ये बताया था कि सुल्ताना की हत्या पुलिस ने नहीं लाखन डाकू ने की है। उसको सजा मिलनी चाहिए। पुतली ने कई दिनों तक इंतजार किया कोई न्याय नहीं मिला।

बाबू लोहार हर दिन बलात्कार करने लगा
सुल्ताना की मौत के बाद पुतली बाई अकेली और लाचार हो चुकी थी। बाबू लोहार गैंग का मुखिया बन गया था। बाबू पहले से ही पुतली की खूबसूरती का कायल था। अब हर दिन उसका बलात्कार करने लगा। डाकुओं से घिरी पुतली कुछ नहीं कर सकती थी इसलिए सब कुछ बर्दाश्त करती गई।

सुल्ताना की मौत का बदला लेकर गैंग की सरदार बन गई
लाखन और बाबू की गैंग एक साथ ही उठा-बैठा करती थी। इन्होंने अपनी लूट और हत्या की वारदातों को और ज्यादा बढ़ा दिया। पुलिस सख्ते में आई और इनके पीछे पड़ गई। एक दिन बीहड़ में बाबू लोहार और लाखन की गैंग साथ में बैठी थी पुलिस ने हमला बोल दिया।

पुतली बाई इसी दिन का इंतजार कर रही थी। बाबू लोहार, कल्ला और लाखन पुलिस की गोलियों का जवाब देने में लगे थे तभी पुतली बाई ने बंदूक उठाई और इन तीनों को गोलियों से भून दिया और अपने पति की मौत का बदला ले लिया। अब 30 साल की पुतली बाई ही गैंग की सरदार थी।

अपना दाहिना हाथ कटवा दिया, बाएं हाथ से सटीक निशाना लगाने लगी
बड़ी गैंग को चलाने के लिए पुतली को और ज्यादा पैसों की जरूरत थी। उसने लूट अपहरण की वारदातों को तेज कर दिया। पूरे चंबल में उसके नाम की तूती बोलने लगी थी। लोग खौफ में जीने लगे थे। अपहरण के बाद फिरौती न मिलने पर हत्या कर देती थी और उसकी लाश को उसके घर पार्सल करवा देती थी।


इन खौफनाक वारदातों के चलते पुलिस की कई टीमें जंगल में उतर चुकी थीं। पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में पुतली के दाएं कंधे पर गोली लग गई थी। हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया था। शरीर में गोली का जहर ना फैले इसलिए पुतली ने अपनी गैंग के एक डाकू से बोलकर अपना हाथ ही कटवा लिया था।

हाथ न होने की वजह से उसे बंदूक चलाने में दिक्कत आने लगी थी इसलिए लेफ्टी पुतली ने बाएं हाथ से गोली चलाना सीखा। कुछ ही दिनों में वो अपने बाएं हाथ से इतना सटीक निशाना लगाने लगी थी कि बाकी डाकू उसका निशाना देख अचंभित होते थे। उसका खौफ इतना ज्यादा बढ़ चुका था कि भिंड, मुरैना, ग्वालियर से लेकर चित्रकूट, इटावा जिलों तक के लोग उसका नाम सुनते ही सहम जाते थे।

32 साल की उम्र में एनकाउंटर हो गया
पुतली की वारदातों के चलते नेहरू सरकार भी सकते में आ गई थी। उन्होंने स्पेशल टीमों के गठन कर तुरंत कार्यवाई करने के निर्देश दिए। एसटीएफ की टीमों ने जंगल में डेरा डाल दिया। 23 जनवरी 1958 को कोथर गांव में पुलिस ने पुतली की गैंग को चारों तरफ से घेर लिया।

कई घंटों की फायरिंग के बाद पुलिस ने पुतली और उसकी गैंग के कई सदियों को मार गिराया। जिस वक्त पुतली का एनकाउंटर हुआ तब वो केवल 32 साल की थी। इस मुठभेड़ में पुलिस के भी कुछ जवान शहीद हुए थे।


पुतली की बेटी कलकत्ता में व्यापार कर रही है
पुतली की हत्या के बाद लोगों ने उसकी और उसके 8 साथियों की लाशों के साथ मुरैना में प्रदर्शन किया था। पुतली की मां असगरी और उसकी बेटी तन्नो इस घटना के बाद सदमे में थीं। बाद में वो कलकत्ता शिफ्ट हो गईं। अब तो पुतली की बेटी तन्नो भी करीब 70 साल की हो गई हैं। कलकत्ता में उनका बिजनेस है। पुतली की मौत के 64 साल बाद भी उसे चंबल की पहली और सबसे खूबसूरत महिला डाकू के तौर पर याद किया जाता है।

पुतली के जीवन पर कई सुपरहिट फिल्में बनीं, अब एक और बन सकती है
पुतली की मौत के 14 साल बाद, साल 1972 में पुतली के जीवन पर एक सुपरहिट फिल्म बनाई गई थी। फिल्म का नाम पुतली बाई ही था। फिल्म को अशोक रॉय ने डायरेक्ट किया था। पुतली बाई का किरदार अभिनेत्री वीणा ने निभाया था। इस फिल्म के अलावा भी उसके जीवन पर कई फिल्में बनी।

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